मिथबस्टर्स

यह बार-बार देखा गया है कि यूट्यूब, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि जैसे सोशल मीडिया माध्यमों के माध्यम से विभिन्न प्रकार की फर्जी खबरें प्रसारित की जाती हैं, जिनकी जनसामान्य तक व्यापक पहुँच होती है। ये फर्जी खबरें निराधार होती हैं तथा इनमें कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं होता। अपनी प्रस्तुति के कारण ये नागरिकों में भय एवं भ्रम की स्थिति उत्पन्न करती हैं। इन माध्यमों से प्रसारित हो रही भ्रामक एवं गलत सूचनाओं के संदर्भ में, एफएसएसएआई विषय विशेषज्ञों से परामर्श कर इन फर्जी खबरों पर स्पष्टीकरण जारी करता है। एफएसएसएआई नागरिकों से यह भी आग्रह करता है कि वे ऐसी फर्जी खबरों पर विश्वास न करें और न ही उन्हें अपने सोशल मीडिया माध्यमों के द्वारा प्रसारित करें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन - दक्षिण-पूर्व एशिया द्वारा जारी दिशा-निर्देश

आइसक्रीम एवं फ्रोजन डेज़र्ट के संबंध में स्पष्टीकरण:

आइसक्रीम एवं फ्रोजन डेज़र्ट, एफएसएस (एफपीएस एवं एफए) विनियम, 2011 के अंतर्गत मानकीकृत उत्पाद हैं तथा इन्हें एफएसएस (लेबलिंग) विनियम के साथ-साथ संबंधित मानकों में निर्दिष्ट विशेष लेबलिंग आवश्यकताओं का पालन करना होता है। ये मानक/विनियम जोखिम मूल्यांकन तथा हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श एवं विचार-विमर्श के उपरांत तैयार किए गए हैं। चूँकि फ्रोजन डेज़र्ट के निर्माण में वनस्पति तेल जैसे घटकों के उपयोग की अनुमति संबंधित मानकों में दी गई है, अतः यदि उत्पाद एफएसएसआर की आवश्यकताओं का अनुपालन करता है, तो यह मानव उपभोग के लिए सुरक्षित है।

पैकेज्ड नमक में डिटर्जेंट की मिलावट संबंधी स्पष्टीकरण:

सोशल मीडिया पर एक वीडियो प्रसारित हुआ जिसमें नमक में डिटर्जेंट मिलाने का दावा किया गया।वीडियो: नमक में डिटर्जेंट मिलावट संबंधी मिथक external link

जब किसी ठोस पदार्थ (विलेय) को किसी द्रव (विलायक) में पूर्णतः घोल दिया जाता है, तो उसे विलयन कहा जाता है। इस संदर्भ में, नमक (विलेय) जल (विलायक) में घुलकर विलयन बनाता है। प्रत्येक विलेय के लिए एक निश्चित मात्रा के विलायक में घुलने की अधिकतम सीमा होती है, जिसे संतृप्ति बिंदु कहा जाता है।

सामान्यतः 100 मि.ली. जल में अधिकतम 35 ग्राम शुद्ध नमक घुल सकता है (संतृप्त विलयन)। यदि इससे अधिक नमक मिलाया जाए तो वह नहीं घुलेगा। इसी प्रकार अधिक मात्रा में नमक घोलने हेतु अधिक जल की आवश्यकता होती है। उदाहरणतः 500 ग्राम नमक लगभग 1.5 लीटर जल में घुल सकता है।

वीडियो में कम मात्रा के जल में अधिक मात्रा में नमक मिलाया गया, जिससे गांठें एवं झाग बने, जिन्हें गलत रूप से डिटर्जेंट की मिलावट समझ लिया गया। साथ ही, कुछ अघुलनशील कण जैसे सिलिका, फॉस्फेट, सल्फेट, अनुमत खाद्य योजक, तथा डबल फोर्टिफाइड सॉल्ट में एनकैप्सुलेटेड फेरस फ्यूमरेट कण दिखाई दे सकते हैं, जो एफएसएस विनियम 2011 के अंतर्गत अनुमेय हैं तथा मिलावट नहीं माने जाते।

चॉकलेट में कीटों की अनुमति संबंधी स्पष्टीकरण:

एफएसएसएआई के मानकों के अनुसार, किसी भी चॉकलेट में कीट या अन्य अशुद्धियाँ नहीं होनी चाहिए। यह दावा कि चॉकलेट निर्माण में कीटों की अनुमति दी गई है, पूर्णतः असत्य है।

पोल्ट्री उत्पादों के उपभोग एवं कोरोना वायरस संबंधी स्पष्टीकरण:

उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2019-nCoV का प्रमुख संक्रमण मानव से मानव में होता है। अब तक किसी भी वैश्विक रिपोर्ट में पोल्ट्री को संक्रमण के स्रोत के रूप में नहीं पाया गया है। अतः वर्तमान ज्ञान के आधार पर पोल्ट्री उत्पादों का सेवन सुरक्षित माना जा सकता है।

नमक में फेरोसाइनाइड्स की उपस्थिति संबंधी स्पष्टीकरण:

फेरोसाइनाइड्स सामान्य नमक, आयोडीन युक्त नमक एवं आयरन युक्त नमक में एंटी-केकिंग एजेंट के रूप में अनुमोदित हैं। निर्धारित सीमा के भीतर इनका उपयोग सुरक्षित माना जाता है।

प्लास्टिक अंडों के संबंध में स्पष्टीकरण:

वर्तमान में संपूर्ण अंडे के कृत्रिम निर्माण हेतु कोई तकनीक उपलब्ध नहीं है। अंडों की गुणवत्ता में अंतर उनके आहार, नस्ल एवं भंडारण के कारण होता है, न कि कृत्रिम निर्माण के कारण।

शिशु दूध में मेलामाइन की उपस्थिति संबंधी स्पष्टीकरण:

मेलामाइन का खाद्य पदार्थों में उपयोग अनुमत नहीं है। हालांकि, संदूषण की स्थिति में इसकी अधिकतम सीमा निर्धारित की गई है, जो उपभोक्ता सुरक्षा के दृष्टिकोण से तय की गई है।

गेहूं के आटे में प्लास्टिक की उपस्थिति संबंधी स्पष्टीकरण:

गेहूं के आटे में उपस्थित ग्लूटेनिन एवं ग्लियाडिन जल के साथ मिलकर ग्लूटेन बनाते हैं, जिसे गलत रूप से प्लास्टिक समझ लिया जाता है।

बाजार में प्लास्टिक चावल की उपस्थिति संबंधी स्पष्टीकरण:

चावल का जलने एवं उछलने का गुण उसकी प्राकृतिक संरचना के कारण होता है, न कि प्लास्टिक की उपस्थिति के कारण।

नाश्ते में प्लास्टिक की उपस्थिति संबंधी स्पष्टीकरण:

नमकीन एवं चिप्स जैसे खाद्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट एवं वसा होने के कारण जलने की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है, जिसे गलत रूप से प्लास्टिक समझ लिया जाता है।